मंगलवार, 23 जनवरी 2018

पूना पैकट: दलित गुलामी का दस्तावेज़ (24 सितंबर को पूना पैक्ट दिवस पर विशेष)

poonapact
भारतीय हिन्दू समाज में जाति को आधारशिला माना गया है . इस में श्रेणीबद्ध असमानता के ढांचे में अछूत सबसे निचले स्तर पर हैं जिन्हें 1935 तक सरकारी तौर पर ‘ डिप्रेस्ड क्लासेज’ कहा जाता था. गांधीजी ने उन्हें ‘हरिजन’ के नाम से पुरस्कृत किया था जिसे अधिकतर अछूतों ने स्वीकार नहीं किया था. अब उन्होंने अपने लिए ‘दलित’ नाम स्वयम चुना है जो उनकी पददलित स्थिति का परिचायक है. वर्तमान में वे भारत की कुल आबादी का लगभग छठा भाग (16.20 %) तथा कुल हिन्दू आबादी का पांचवा भाग (20.13 %) हैं. अछूत सदियों से हिन्दू समाज में सभी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व शैक्षिक अधिकारों से वंचित रहे हैं और काफी हद तक आज भी हैं.
दलित कई प्रकार की वंचनाओं एवं निर्योग्यताओं को झेलते रहे हैं. उनका हिन्दू समाज एवं राजनीति में बराबरी का दर्जा पाने के संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है. जब श्री. ई. एस. मान्तेग्यु, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया, ने पार्लियामेंट में 1917 में यह महत्वपूर्ण घोषणा की कि ‘”अंग्रेजी सरकार का अंतिम लक्ष्य भारत को डोमिनियन स्टेट्स देना है तो दलितों ने बम्बई में दो मीटिंगें कर के अपना मांग पत्र वाइसराय तथा भारत भ्रमण पर भारत आये सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया को दिया. परिणामस्वरूप निम्न जातियों को बिभिन्न प्रान्तों में अपनी समस्यायों को 1919 के भारतीय संवैधानिक सुधारों के पूर्व भ्रमण कर रहे कमिशन को पेश करने का मौका मिला.
तदोपरांत विभिन्न कमिशनों , कांफ्रेंसों एवं कौंसिलों का एक लम्बा एवं जटिल सिलसिला चला. सन 1918 में मान्तेग्यु चैमस्फोर्ड रिपोर्ट के बाद 1924 में मद्दीमान कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें कौंसलों में डिप्रेस्ड क्लासेज के अति अल्प प्रतिनिधित्व और उसे बढ़ाने के उपायों के बारे में बात कही गयी. साईमन कमीशन (1928) ने स्वीकार किया कि डिप्रेस्ड क्लासेज को पर्याप्त प्रातिनिधित्व दिया जाना चाहिए. सन 1930 से 1932 एक लन्दन में तीन गोलमेज़ कान्फ्रेंसें हुयीं जिन में अन्य अल्प संख्यकों के साथ साथ दलितों के भी भारत के भावी संविधान के निर्माण में अपना मत देने के अधिकार को मान्यता मिली. यह एक ऐतहासिक एवं निर्णयकारी परिघटना थी . इन गोलमेज़ कांफ्रेंसों में डॉ. बी. आर. आंबेडकर तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा दलितों के प्रभावकारी प्रतिनिधित्व एवं ज़ोरदार प्रस्तुति के कारण 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित ‘कमिनुअल अवार्ड’ में दलितों को पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार मिला. इस अवार्ड से दलितों को आरक्षित सीटों पर पृथक निर्वाचन द्वारा अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला और साथ ही सामान्य जाति के निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्णों को चुनने हेतु दो वोट का अधिकार भी प्राप्त हुआ. इस प्रकार भारत के इतिहास में अछूतों को पहली वार राजनैतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रप्त हुआ जो उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता था.
उक्त अवार्ड द्वारा दलितों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 में अल्प संख्यकों के रूप में मिली मान्यता के आधार पर अन्य अल्प संख्यकों – मुसलमानों, सिक्खों, ऐंग्लो इंडियनज तथा कुछ अन्य के साथ साथ पृथक निर्वाचन के रूप में प्रांतीय विधायकाओं एवं केन्द्रीय एसेम्बली हेतु अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला तथा उन सभी के लिए सीटों की संख्य निश्चित की गयी. इसमें अछूतों के लिए 78 सीटें विशेष निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में आरक्षित की गयीं.
गाँधी जी ने उक्त अवार्ड की घोषणा होने पर यरवदा (पूना) जेल में 18 अगस्त, 1932 को दलितों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 से आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी. गाँधी जी का मत था कि इससे अछूत हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे जिससे हिन्दू समाज व हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा. यह ज्ञातव्य है कि उन्होंने मुसलमानों, सिक्खों व ऐंग्लो- इंडियनज को मिले उसी अधिकार का कोई विरोध नहीं किया था. गाँधी जी ने इस अंदेशे को लेकर 18 अगस्त, 1932 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री, श्री रेम्ज़े मैकडोनाल्ड को एक पत्र भेज कर दलितों को दिए गए पृथक निर्वाचन के अधिकार को समाप्त करके संयुक्त मताधिकार की व्यवस्था करने तथा हिन्दू समाज को विघटन से बचाने की अपील की. इसके उत्तर में ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने अपने पत्र दिनांकित 8 सितम्बर, 1932 में अंकित किया , ” ब्रिटिश सरकार की योजना के अंतर्गत दलित वर्ग हिन्दू समाज के अंग बने रहेंगे और वे हिन्दू निर्वाचन के लिए समान रूप से मतदान करेंगे, परन्तु ऐसी व्यवस्था प्रथम 20 वर्षों तक रहेगी तथा हिन्दू समाज का अंग रहते हुए उनके लिए सीमित संख्या में विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे ताकि उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके. वर्तमान स्थिति में ऐसा करना नितांत आवश्यक हो गया है. जहाँ जहाँ विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे वहां वहां सामान्य हिन्दुओं के निर्वाचन क्षेत्रों में दलित वर्गों को मत देने से वंचित नहीं किया जायेगा. इस प्रकार दलितों के लिए दो मतों का अधिकार होगा – एक विशेष निर्वाचन क्षेत्र के अपने सदस्य के लिए और दूसरा हिन्दू समाज के सामान्य सदस्य के लिए. हम ने जानबूझ कर – जिसे आप ने अछूतों के लिए सम्प्रदायक निर्वाचन कहा है ,उसके विपरीत फैसला दिया है. दलित वर्ग के मतदाता सामान्य अथवा हिन्दू निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्ण उमीदवार को मत दे सकेंगे तथा सवर्ण हिन्दू मतदाता दलित वर्ग के उमीदवार को उसके निर्वाचन क्षेत्र में मतदान क़र सकेंगे. इस प्रकार हिन्दू समाज की एकता को सुरक्षित रखा गया है.” कुछ अन्य तर्क देने के बाद उन्होंने गाँधी जी से आमरण अनशन छोड़ने का आग्रह किया था.
परन्तु गाँधी जी ने प्रत्युत्तर में आमरण अनशन को अपना पुनीत धर्म मानते हुए कहा कि दलित वर्गों को केवल दोहरे मतदान का अधिकार देने से उन्हें तथा हिन्दू समाज को छिन्न – भिन्न होने से नहीं रोका जा सकता. उन्होंने आगे कहा, ” मेरी समझ में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था करना हिन्दू धर्म को बर्बाद करने का इंजेक्शन लगाना है. इस से दलित वर्गों का कोई लाभ नहीं होगा.” गंधी जी ने इसी प्रकार के तर्क दूसरी और तीसरी गोल मेज़ कांफ्रेंस में भी दिए थे जिसके प्रत्युत्तर में डॉ. आंबेडकर ने गाँधी जी के दलितों के भी अकेले प्रतिनिधि और उनके शुभ चिन्तक होने के दावे को नकारते हुए उनसे दलितों के राजनीतिक अधिकारों का विरोध न करने का अनुरोध किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल दलित केवल स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकारों की ही मांग कर रहे हैं न कि हिन्दुओं से अलग हो अलग देश बनाने की. परन्तु गाँधी जी का सवर्ण हिन्दुओं के हित को सुरक्षित रखने और अछूतों को हिन्दू समाज का गुलाम बनाये रखने का स्वार्थ था. यही कारण था कि उन्होंने सभी तथ्यों व तर्कों को नकारते हुए 20 सितम्बर, 1932 को अछूतों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन शुरू कर दिया. यह एक विकट स्थिति थी. एक तरफ गाँधी जी के पक्ष में एक विशाल शक्तिशाली हिन्दू समुदाय था, दूसरी तरफ डॉ. आंबेडकर और अछूत समाज. अंतत भारी दबाव एवं अछूतों के संभव जनसंहार के भय तथा गाँधी जी की जान बचाने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर तथा उनके साथियों को दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार की बलि देनी पड़ी और सवर्ण हिन्दुओं से 24 सितम्बर , 1932 को तथाकथित पूना पैक्ट करना पड़ा. इस प्रकार अछूतों को गाँधी जी की जिद्द के कारण अपनी राजनैतिक आज़ादी के अधिकार को खोना पड़ा.
यद्यपि पूना पैक्ट के अनुसार दलितों के लिए ‘ कम्युनल अवार्ड ‘ में सुरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 78 से 151 हो गयी परन्तु संयुक्त निर्वाचन के कारण उनसे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार छिन्न गया जिसके दुष्परिणाम आज तक दलित समाज झेल रहा है. पूना पैकट के प्रावधानों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1935 में शामिल करने के बाद सन 1937 में प्रथम चुनाव संपन्न हुआ जिसमें गाँधी जी के दलित प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा कोई भी दखल न देने के दिए गए आश्वासन के बावजूद कांग्रेस ने 151 में से 78 सीटें हथिया लीं क्योंकि संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में दलित पुनः सवर्ण वोटों पर निर्भर हो गए थे . गाँधी जी और कांग्रेस के इस छल से खिन्न होकर डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ” पूना पैकट में दलितों के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है.”
कम्युनल अवार्ड के माध्यम से अछूतों को जो पृथक निर्वाचन के रूप में अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने और दोहरे वोट के अधिकार से सवर्ण हिन्दुओं की भी दलितों पर निर्भरता से दलितों का स्वंतत्र राजनीतिक अस्तित्व सुरक्षित रह सकता था परन्तु पूना पैक्ट करने की विवशता ने दलितों को फिर से स्वर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना दिया. इस व्यवस्था से आरक्षित सीटों पर जो सांसद या विधायक चुने जाते हैं वे वास्तव में दलितों द्वारा न चुने जा कर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं सवर्णों द्वारा चुने जाते हैं जिन्हें उन का गुलाम/ बंधुआ बन कर रहना पड़ता है. सभी राजनैतिक पार्टियाँ गुलाम मानसिकता वाले ऐसे प्रतिनिधियों पर कड़ा नियंत्रण रखती हैं और पार्टी लाइन से हट कर किसी भी दलित मुद्दे को उठाने या उस पर बोलने की इजाजत नहीं देतीं. यही कारण है कि लोकसभा तथा विधान सभायों में दलित प्रतिनिधियों कि स्थिति महाभारत के भीष्म पितामह जैसी रहती है जिस ने यह पूछने पर कि ” जब कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था तो आप क्यों नहीं बोले?” इस पर उन का उत्तर था, ” मैंने कौरवों का नमक खाया था.”
वास्तव में कम्युनल अवार्ड से दलितों को स्वंतत्र राजनैतिक अधिकार प्राप्त हुए थे जिससे वे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के लिए सक्षम हो गए थे और वे उनकी आवाज़ बन सकते थे. इस के साथ ही दोहरे वोट के अधिकार के कारण सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू भी उन पर निर्भर रहते और दलितों को नाराज़ करने की हिम्मत नहीं करते. इस से हिन्दू समाज में एक नया समीकरण बन सकता था जो दलित मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता. परन्तु गाँधी जी ने हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के विघटित होने की झूठी दुहाई दे कर तथा आमरण अनशन का अनैतिक हथकंडा अपना कर दलितों की राजनीतिक स्वतंत्रता का हनन कर लिया जिस कारण दलित सवर्णों के फिर से राजनीतिक गुलाम बन गए. वास्तव में गाँधी जी की चाल काफी हद तक राजनीतिक भी थी जो कि बाद में उनके एक अवसर पर सरदार पटेल को कही गयी इस बात से भी स्पष्ट है:
” अछूतों के अलग मताधिकार के परिणामों से मैं भयभीत हो उठता हूँ. दूसरे वर्गों के लिए अलग निर्वाचन अधिकार के बावजूद भी मेरे पास उनसे सौदा करने की गुंजाइश रहेगी परन्तु मेरे पास अछूतों से सौदा करने का कोई साधन नहीं रहेगा. वे नहीं जानते कि पृथक निर्वाचन हिन्दुओं को इतना बाँट देगा कि उसका अंजाम खून खराबा होगा. अछूत गुंडे मुसलमान गुंडों से मिल जायेंगे और हिन्दुओं को मारेंगे. क्या अंग्रेजी सरकार को इस का कोई अंदाज़ा नहीं है? मैं ऐसा नहीं सोचता.” (महादेव देसाई, डायरी, पृष्ट 301, प्रथम खंड).
गाँधी जी के इस सत्य कथन से आप गाँधी जी द्वारा अछूतों को पूना पैक्ट करने के लिए बाध्य करने के असली उद्देश्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं.
दलितों की संयुक्त मताधिकार व्यवस्था के कारण सवर्ण हिन्दुओं पर निर्भरता के फलस्वरूप दलितों की कोई भी राजनैतिक पार्टी पनप नहीं पा रही है चाहे वह डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ही क्यों न हो. इसी कारण डॉ. आंबेडकर को भी दो वार चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा क्योंकि आरक्षित सीटों पर सवर्ण वोट ही निर्णायक होता है. इसी कारण सवर्ण पार्टियाँ ही अधिकतर आरक्षित सीटें जीतती हैं. पूना पैक्ट के इन्हीं दुष्परिणामों के कारण ही डॉ. आंबेडकर ने संविधान में राजनैतिक आरक्षण को केवल 10 वर्ष तक ही जारी रखने की बात कही थी. परन्तु विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इसे दलितों के हित में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए अब तक लगातार 10-10 वर्ष तक बढाती चली आ रही हैं क्योकि इस से उन्हें अपने मनपसंद और गुलाम दलित सांसद और विधायक चुनने की सुविधा रहती है.
सवर्ण हिन्दू राजनीतिक पार्टियाँ दलित नेताओं को खरीद लेती हैं और दलित पार्टियाँ कमज़ोर हो कर टूट जाती हैं. यही कारण है की उत्तर भारत में तथाकथित दलितों की कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी भी ब्राह्मणों और बनियों के पीछे घूम रही है और ” हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” जैसे नारों को स्वीकार करने के लिए वाध्य है. अब तो उसका रूपान्तार्ण बहुजन से सर्वजन में हो गया है. इन परिस्थितयों के कारण दलितों का बहुत अहित हुआ है वे राजनीतिक तौर प़र सवर्णों के गुलाम बन कर रह गए हैं. अतः इस सन्दर्भ में पूना पैक्ट के औचित्य की समीक्षा करना समीचीन होगा. क्या दलितों को पृथक निर्वाचन की मांग पुनः उठाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ?
यद्यपि पूना पैक्ट की शर्तों में छुआ-छूत को समाप्त करने, सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने तथा दलितों की शिक्षा के लिए बजट का प्रावधान करने की बात थी परन्तु आजादी के 65 वर्ष बाद भी उनके किर्यान्वयन की स्थिति दयनीय ही है. डॉ. आंबेडकर ने अपने इन अंदेशों को पूना पैक्ट के अनुमोदन हेतु बुलाई गयी 25 सितम्बर , 1932 को बम्बई में सवर्ण हिन्दुओं की बहुत बड़ी मीटिंग में व्यक्त करते हुए कहा था, ” हमारी एक ही चिंता है. क्या हिन्दुओं की भावी पीढियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी ? ” इस पर सभी सवर्ण हिन्दुओं ने एक स्वर में कहा था, ” हाँ, हम करेंगे.” डॉ. आंबेडकर ने यह भीं कहा था, ” हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिन्दू सम्प्रदाय एक संघटित समूह नहीं है बल्कि विभिन्न सम्प्रदायों की फेडरेशन है. मैं आशा और विश्वास करता हूँ कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा एक सम्मानजनक भावना से काम करेंगे.” क्या आज सवर्ण हिन्दुओं को अपने पूर्वजों द्वारा दलितों के साथ किये गए इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने के बारे में थोडा बहुत आत्म चिंतन नहीं करना चाहिए. यदि वे इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने में अपना अहित देखते हैं तो क्या उन्हें दलितों के पृथक निर्वाचन का राजनैतिक अधिकार लौटा नहीं देना चाहिए?.............AMIT KATHERIYA
एक बार पढ़ें और जीवनभर कैसे याद रखें **********************************************************************
लगभग सभी दोस्तों की शिकायत यही होती है कि वह पढ़ते हैं परन्तु परीक्षा तक सब पढ़ा हुआ विस्मृत (भूल) हो जाता है। ऐसा लगता है कि यह पढ़ा हुआ है पर लिखना क्या है याद ही नहीं आता। ऐसे में वर्षभर की पढ़ाई बेकार हो जाती है और आप परीक्षा में वांछित अंक नहीं प्राप्त कर पाते। इससे आप में नैराश्य की भावना (निगेटिविटी) प्रबल होने लगती है और आप अवसाद की तरफ बढ़ने लगते हैं।
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प्रतियोगी परीक्षा में महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि आपने कितनी पुस्तकें पढ़ी है या आपको कितना ज्ञान है। परीक्षक को आपके ज्ञान का तनिक भी अंदाजा नहीं होता वह आपका मूल्यांकन आपके द्वारा प्रदत्त उत्तर/आंसर शीट के माध्यम से करता है। अगर आपने वहां अच्छा प्रदर्शन किया है तो आप उसकी नजर में अधिकतम अंक पाने योग्य हैं अन्यथा आप औसत अंक या उससे भी कम अंक पाने योग्य होंगे।
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एक बार पढ़ें और जीवनभर कैसे याद (स्मरण) रखें !
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ऐसे में सभी उम्मीदवारों के समक्ष यह प्रश्न लाजिमी है कि हम एक बार पढ़ी हुई अध्ययन सामग्री कैसे याद रखें। जो टॉपर होते हैं वह कैसे अच्छा उत्तर लेखन या निश्चित समय में अधिकतम प्रश्न मैक्सिमम एक्यूरेसी (अधिकतम विशुद्धता) के साथ हल कर लेते हैं। क्या स्मरण रखने (याद रखने) के लिए भी टिप्स होते हैं जिनके माध्यम से आप अध्ययन सामग्री को अधिकतम समय तक स्मरण रख सकते हो। आज UPSC IAS GURU कि टीम इसी तथ्य (स्मरण क्षमता कैसे बढ़ाएं) पर आपसे चर्चा करेंगे जिससे आप प्रतियोगी परीक्षा में अधिकतम प्रश्न हल कर अपनी सफलता सुनिश्चित कर सकें।
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तो आईये अब हम बढ़ते हैं अपनी ‘स्मरण क्षमता’ बढ़ाने के टिप्स की तरफ जिससे आपको एक बार पढ़ा हुआ आजीवन याद रहें और आप ज्ञान का उपयोग कर परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
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स्मरण शक्ति बढ़ाने के टिप्स
रुचिकर (Interesting)
सभी विद्यार्थी एक ही स्कूल/कॉलेज/कोचिंग में एक ही अध्यपाक से विषय विशेष की पढ़ाई करते हैं, पर कुछ विद्यार्थी पढ़ाया हुआ सब कुछ याद रखते हैं और कुछ को कुछ भी याद नहीं रख पाता। हो सकता है हम वह विद्यार्थी हों, जिन्हें कुछ याद रह जाता है या कुछ भी याद नहीं रहता। आइए अब हम इसका कारण जानते हैं, कि ऐसा क्यों हुआ?
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दोस्तों उत्सुकता और रुची आपके पढ़े हुए को याद रखने के लिए आवश्यक घटक है। हम जो कुछ भी करते है या पढ़ते हैं यदि हमें उसमें उत्सुकता या रुची न हो तो हम चाहे कितने भी पढ़े या याद करे कुछ समयपश्चात ही हम वह पढ़ा हुआ भूल जाएंगे इसलिए हम जो कुछ भी यदि याद करना चाहते है उसमे हमे अपनी उत्सुकता बनाना बहुत जरुरी होता है यदि हम जो कुछ भी पढ़ते है उसे खूब मन लगाकर रुची के साथ याद करे तो निश्चित ही जल्द ही याद कर सकते है।
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ध्यान (Attention)
दोस्तों अपने पाठ्यक्रम के विषय को याद करने के लिए उसमे अपना ध्यान केन्द्रित करना बहुत ही आवश्यक होता है जब हम कभी भी पढ़े तो आस-पास ऐसी चीजे नही होनी चाहिए जिससे की हमारा ध्यान पाठ्य-पुस्तक से भटके इसलिए जो भी पढ़े और पूरी तन्लीनता के साथ पढ़े।
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एकाग्रता (Concentrate of Mind)
जब हम पढ़ रहे हों या याद कर रहे हों तो अपने दिमाग में अन्य चीजे आने का अवसर नहीं प्रदान करना चाहिए अथार्त ख्याली-पुलाव/सपने में गुम नहीं होना चाहिए।क्योंकि सपने तभी सच होते हैं जब हम एकाग्र होकर कठिन परिश्रम द्वारा अध्ययन करते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य मार्ग नहीं है। जब हम सपने देखते हुए पढ़ते हैं तो हमारी नजर तो पुस्तक पर होती है पर दिमाग सपने पर होता है, इसलिए उस समय पढ़ा हुआ कुछ याद नहीं रहता।
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अच्छा वातावरण (Good Environment)
जब आप अध्ययन करें तो यह प्रयास करें कि आपका अध्ययन कक्ष एकदम शांत रहें, बाहर का भी शोर भी आपको सुनाई न पड़े। पढ़ते समय आप फ़ोन/टीवी से भी दूरी रखें। जिससे हमारा ध्यान न भटके और हम एकाग्र होकर पढ़ सके।
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स्वास्थ्य (Good Health)
दोस्तों स्वस्थ शरीर स्वच्छ दिमाग का घर होता है यानी दोस्तों जब हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है तो हमारे मन में अच्छी-अच्छी बातें भी आती है इसलिए हम सभी को अपने पढ़ाई के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना जरुरी होता है फिर जब हम स्वस्थ होंगे तो जो कुछ भी याद करेगे वो हमारे मस्तिष्क में जल्दी से स्टोर हो जायेगा जिसे हम जल्दी नही भूल सकते है।
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अपने अध्ययन याद करने के लिए क्या करे
सर्वप्रथम पाठ्य सामग्री को समझे – आप जो भी पढ़ रहे हैं उसे याद रखने के लिए सबसे आवश्यक है कि आप उसे समझ पा रहे हैं। आप पाठ को तभी उचित ढंग से समझ पाएंगे जब आप पाठ्य में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली से परिचित हों और प्रत्येक वाक्य का अर्थ भी आपकी समझ में आ रहा हो। और आप उसे याद भी तब रख पाएंगे जब उसका उपयोग आप अपने जीवन में समझ पाएंगे। अगर आपको पता होगा कि tan 45˚ का मान की समझ होगी, और एक भुजा का मान दिया गया हो तो आपको दूसरी भुजा का मान निकालने में कोई परेशानी नहीं होगी।
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बोलकर पढ़ें – जब हम एक ही रूटीन से पढ़ते हैं तो भी हमें उस चीज में रुची कम होने लगती हैं और कुछ समय बाद हमें नींद आने लगती हैं। यह समस्या काफी उम्मीदवारों में देखि जाती हैं। तो अपने अध्ययन में रुची विकसित करने के लिए और नींद को भी दूर करने के लिए आप बोलकर पढ़ सकते हैं। काफी विद्यार्थी बोलकर पढ़ते हैं तो उन्हें शीघ्र याद हो जाता हैं, इसके पीछे लॉजिक हैं यदि आप प्राचीन समय को देखें तो लोग श्रवण-मनन (बोलकर-मंथन कर) अध्ययन करते थें। और वह ज्ञान को ऐसे ही सीखते थे तो यह विधि भी आपको देर तक पढ़ने और याद रखने में मदद कर सकती हैं।
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पहले पाठ्य को समझे फिर याद करें – आपको शब्द, संख्या के आधार पर एक प्रतीकात्मक कहानी विकसित करनी हैं और उसे अपने आप पर आरोपित करना है और आप इसे जितना महसूस कर सकोगे या जितने अच्छे से इमेजिन करोगे और एक्सपीरियंस करोगे वह तथ्य आपको उतनी ही आसानी से याद हो जाएगा। अथार्त आपको शब्द और संख्या को पिक्चर में बदल कर याद करना है। महत्त्वपूर्ण तिथियों, घटनाओं को स्मरण रखने के लिए ट्रिक बनाएं और इसे ट्रिक्स से याद रखें। पढ़ाई सामग्री में तारतम्य बनाएं एक घटना को दूसरे घटना से जोड़े तभी आप बुनियादी समझ विकसित कर निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं। जब आप सिन्धु सभ्यता को पढ़ लेते हो और फिर वैदिक सभ्यता का अध्ययन करते हों तो आपको एक गैप नजर आता है। जो आपको इतिहास की वास्तविक समझ और उसकी महत्त्वा समझने में सहायता करती है।
हमारा दिमाग विजुअल की हुई चीजों को अधिक समय तक याद रखता है, इसलिए आपको मूवी याद नहीं करनी पड़ती और आप हु-ब-हु याद रख पाते हों। जब आप पढ़ाई में भी इस तरीके का प्रयोग करते हों तो आप हर जानकारी को नए तरीके से स्टोर करते हों और आपका दिमाग उसे आसानी से स्टोर कर लेते है। और याद की हुई प्रत्येक तथ्य को याद रखने में समर्थ होने लगते हों-
हर-बार ग़ालिब एक ही गलती करता रहा
धुल चेहरे पर थी, वह आईना साफ़ करता रहा
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आपको याद नहीं हो रहा तो उसके पीछे पड़ने की जरुरत नहीं है बल्कि याद करने के तरीके को बदलने की जरुरत है, जब आप तरीका बदलेंगे तो आप पाएंगे आप अब समझने और याद करने में कैसे सफल हो रहे हैं। तो अपना तरीका बदलो और सब कुछ याद रखों। अपनी पढ़ाई में उत्सुकता बनानी चाहिए और पढ़ाई करने के नियम हमे खुद से बनाने चाहिए की कब क्या कौन सा विषय पढ़ना है और हमें पढ़ाई में मन लगाने के उपाय पर जरूर अमल करना चाहिए।
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गणित और विज्ञान रटने से अच्छा है हमे उनके फार्मूला याद करना चाहिए और वे फार्मूला किस प्रकार काम करते है ये समझना बहुत जरुरी होता है। गणित के फ़ॉर्मूले आपको अभ्यास करते-करते स्वतः ही याद हो जाते हैं। इतिहास और राजनीति विज्ञान के तिथियाँ और अनुच्छेद याद रखने के लिए शार्टट्रिक का प्रयोग करें।
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पढ़ा हुआ लिखें –आपने जब कोई पाठ पढ़ा तो पुस्तक बंद कर उसे लिखें और बाद में उसे मिलाएं और हुई गलती को देखें और फिर से पाठ पढ़कर यह प्रक्रिया तब तक दुहराएं जब तक आपको याद न हो जाए और आप पढ़े हुए तथ्यों को सही तरीके से लिख न सकें। जब हम लिखकर कोई भी चीज याद करेगे तो वो चीजे जल्दी याद होंगी। जब चीजे याद हो जाए तो उसका नोट्स भी बना लें। फिर चाहें तो उसका ऑडियो भी रिकॉर्ड कर सुन सकते हैं, यह भी आपको याद करने में सहायता करेगा।
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प्रतिदिन आधार पर अध्ययन करें खुद से प्रश्न पूंछे – जो कुछ भी याद करे उसे प्रतिदिन आधार पर एक-एक पाठ के रूप में याद करना चाहिए। अगर एक दिन में सारी पुस्तक को ख़त्म करने बठेंगे तो कुछ भी याद नही होगा और जो कुछ भी याद रहेगा उसे भी भूलने का डर रहता है यानी पढ़ाई करने के नियम हमे अच्छे से फॉलो करना चाहिए। इसके अतिरिक्त आपने जो पाठ उससे सम्बंधित कुछ प्रश्न मन में सोंचे और उसके उत्तर दें, यह प्रक्रिया आपके दिमाग को काफी तेज कर देता हैं और आपके उत्तर देने के कौशल को भी निखारता है।
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रिविजन अवश्य करें – टाइम टेबल में पुनरावृत्ति के लिए पर्याप्त वक्त रखें, जिससे आखिरी समय में परेशानी न हो। जैसे ही कोचिंग समाप्त होती है अपने क्लास नोट्स की पुनरावृत्ति कर लें। अगर आप कोचिंग नहीं लेते तो कल के पढ़ें हुए अध्ययन को दोहरा लें और फिर नया अध्ययन करें। दोहराने की प्रक्रिया अगले दिन अध्ययन शुरू होने से पहले और फिर सप्ताह के अंत में और फिर महीने भर में जितना पढ़ा उसे दुहराने की होनी चाहिए। अलग-अलग तरीकों से पुनरावृत्ति करें ताकि आपको पढ़ने में भी मजा आए। इससे आप पढ़ी हुए सामग्री को भूलेंगे नहीं। कई बार दूसरों के साथ अध्ययन करने पर आप यह जान सकते हैं कि विषय को पूरी तरह से समझ पायें हैं या नहीं। यदि आपने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और उसे आप दूसरों को अच्छी तरह समझा पाने में सफल हो गए तो समझिए कि आपके द्वारा अध्ययन किये गए विषय को आपने आत्मसात कर लिया। वरना आप महसूस करेंगे कि अभी कुछ और मेहनत करना जरूरी है। तो दोस्तों हम जो कुछ भी याद करे उसे बार बार दोहराते जरुर रहे तो हम कभी भी उसे भूल नही सकते।
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तो दोस्तों आप सबको यह याद करने का तरीका कैसा लगा हमें कमेंट बॉक्स में अपनी राय लिख कर जरूर बताएं।
हमें आशा है आप ‘एक बार पढ़ें और जीवनभर कैसे याद रखें !‘ के तहत प्राप्त आवश्यक जानकारियों से परिचित हुए होंगे और यह तथ्य आपकी सफलता में भी सहायक होंगे। तो एकाग्रचित्त होकर पढ़ाई में जुट जाइए और तब तक न रुकें जब तक मुक़ाम हासिल न हो जाए।

अब आप खुद ही लॉक कर सकते हैं अपना आधार डेटा, जानिए तरीका........

500 रुपए में आधार से जुड़ा पूरा डेटा खरीदे जाने की खबरों के बीच UIDAI यानि यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने सफाई देते हुए कहा है कि आधार डेटा पूरी तरह से सुरक्षित है। UIDAI ने कहा है कि आधार डेटा के लीक से जुड़ी सभी खबरें बेबुनियाद हैं। एक अंग्रेजी अखबार द्वारा जारी की गई एक खबर में खुलासा किया गया था कि एक व्‍हाट्ऐप ग्रुप 500 रुपए में देश भर के करोंड़ो लोगों को आधार डेटा आसानी से किसी को भी उपलब्‍ध करा रहा है, जिसे UIDAI ने खारिज कर दिया है। वैसे हम आपको यहां बताने वाले हैं कि अगर आप चाहें तो अपने आधार डेटा को घर बैठे बैठे लॉक कर सकते हैं, फिर उस डेटा को कोई भी देख नहीं पाएगा। 

UIDAI का दावा आधार डेटा से बायोबायोमेट्रिक डीटेल कोई हासिल नहीं कर सकता
आधार डेटा ब्रीच को लेकर UIDAI का दावा है कि हम आधार डेटा के उपयोग को लेकर पूरी तरह से आश्‍वस्‍त हैं। सरकार की तमाम योजनाओं से आधार को जोड़ने की खातिर तमाम विभागों और टेलीकॉम कंपनियों को आधार डेटा देखने की अनुमति दी गई है, लेकिन वो उसका कोई दुरुपयोग नहीं कर सकते हैं। UIDAI का यह भी कहना है कि आधार का डेटा जहां जहां भी एक्‍सेस किया जा रहा है, हमें उसे पूरी तरह से ट्रेस कर रहे हैं और कोई भी ट्रांसेक्‍शन हमारी परमीशन के बिना नहीं हो रहा है।
आधार डेटा के दुरुपयोग को लेकर UIDAI का यह भी कहना है कि जहां जहां भी आधार

डेटा एक्‍सेस हो रहा है, वहां सिर्फ नाम और बेसिक जानकारी ही दी जा रही है। कोई भी विभाग और कंपनी किसी भी आधार नंबर से जुड़ा बायोमेट्रिक डेटा यानि फिंगर प्रिंट्स आदि हासिल नहीं कर सकता।
 अपना आधार डेटा कर सकते हैं Lock
वैसे तो हम सभी का आधार डेटा पूरी तरह से सुरक्षित है और कोई उसका दुरुपयोग नहीं कर सकता, लेकिन फिर अगर आप चाहें तो अपने आधार डेटा और बायोमेट्रिक डीटेल्‍स को लॉक कर सकते हैं। लॉक करने का मतलब यह है कि जब आप चाहें आधार डेटा को ओपन कर यूज कर लें और जब कोई जरूरत न हो तब आप उस डेटा को लॉक कर सकते है। आधार डेटा को लॉक करने के बाद अगर आप किसी बायोमेट्रिक डिवाइस में अपना अंगूठा लगाएंगे तो वो डेटा एक्‍सेस नहीं होगा। कहने का मतलब यह है कि आपकी मर्जी के बिना कोई भी आपके आधार डेटा को देख या यूज नहीं कर पाएगा।

आधार डेटा को लॉक कैसे करें
अपने आधार डेटा को लॉक करने के लिए UIDAI सर्विस से जुड़े इस वेबपेज पर विजिट करें - https://resident.uidai.gov.in/biometric-lock। इस पेज पर नीचे की तरफ आपको एक ऑप्‍शन दिखेगा Lock your Biometrics। इस ऑप्‍शन में अपना आधार नंबर और सेक्‍योरिटी कोड लिखकर OTP मंगाएं



OTP इंटर करें
आपके रजिस्‍टर्ड फोन पर UIDAI से एक OTP आएगा, जिसे इनेबल / डिसेबल Biometric लॉक ऑप्‍शन के नीचे दिए OTP स्‍पेस में भरें। OTP डालते ही आपके सामने एक पेज खुलेगा। यहां ऑप्‍शन दिखेगा Enable Biometric Lock और इसके बगल में एक चेकबॉक्‍स लगा होगा। यहां क्लिक करते ही आपका आधार डेटा लॉक हो जाएगा।
 आधार डेटा इनेबल / डिसेबल कैसे करें
जब भी आपको अपना आधार डेटा किसी बायोमेट्रिक डिवाइस पर एक्‍सेस करना हो, तो आप इसी पेज पर जाकर इस चेकबॉक्‍स को अनचेक कर सकते हैं। ध्‍यान रहे इनेबल करने के 20 मिनट बाद आपका आधार डेटा फिर से अपने आप लॉक हो जाएगा। अगर आप अपने डेटा को परमानेंट खुला रखना चाहते हैं तो https://resident.uidai.gov.in/biometric-lock इस पेज पर जाकर अपने आधार लॉक को डिसेबल कर दें। अब आपका आधार डेटा हमेशा के लिए ओपन हो जाएगा। .....AMIT KATHERIYA

आपके आधार नंबर पर कितने मोबाइल कनेक्‍शन चल रहे हैं? पता कर लो, वर्ना....
…….यह बात जानते हैं कि एक आधार नंबर से कितने मोबाइल कनेक्‍शन लिए जा सकते हैं? अगर नहीं तो आप इकलौते नहीं हैं, क्‍योंकि ज्‍यादातर लोगों को यह बात तब तक पता नहीं चली थी, जब तक एक महिला ने अपने आधार से लिंक किए गए 9 फर्जी कनेक्‍शनों को बंद कराने के लिए UIDAI से लेकर मोबाइल कंपनी की नाक में दम न कर दिया। इसके बाद UIDAI ने खुद ट्वीट करके बताया कि आधार नंबर से कम से कम किसी यूजर को यह तो पता चल पा रहा है कि उसके नाम से फर्जी कनेक्‍शन चल रहे हैं, वर्ना पहले ऐसी कोई व्‍यवस्‍था नहीं थी। वैसे आपके आधार का कोई मिसयूज तो नहीं कर रहा? अगर आपको यह पता करना है तो यहां जानिए फटाफट।
UIDAI को ट्वीट करके सुर्खियों में आई महिला के कारण लोगों को मिली नई जानकारी
प्रिया नाम की इस महिला ने जब अपने 18 साल पुराने मोबाइल नंबर को बायोमेट्रिक द्वारा आधार से वेरीफाई कराने की कोशिश की तो उसे एयरटेल ने बताया कि वो ऐसा नहीं कर सकती, क्‍यों‍कि उसके आधार नंबर पर पहले से ही 9 मोबाइल सिम इश्‍यू किए जा चुके हैं। कहने का मतलब यह है कि एक आधार नंबर पर मैक्सिमम 9 मोबाइल कनेक्‍शन जारी हो सकते हैं। हालांकि जब महिला ने आधार अथॉरिटी और एयरटेल को ट्वीट करके हंगामा मचा दिया तो मोबाइल कंपनी ने 5 दिन बाद कहा कि सब ठीक है आपके आधार पर सिर्फ आपका ही नंबर चल रहा है। ऐसा कारनामा कैसे हुआ, यह तो मोबाइल कंपनी ही बात सकती है। फिर हम यहां बता रहे हैं वो 5 आसान स्‍टेप्‍स, जिनसे आप जान सकते हैं कि कहीं आपके आधार नंबर का भी तो मिसयूज नहीं हो रहा।

1- आधार की ऑफीशियल वेबसाइट पर जाइए
आपको सबसे पहले आधार यानि UIDAI की ऑफीशियल वेबसाइट (https://uidai.gov.in/) पर जाना होगा। इसके होम पेज के दाहिनी ओर Aadhar Services सेक्‍शन में लास्‍ट यानि चौथे नंबर पर दिए ऑप्‍शन पर क्लिक करें। इसका नाम है Aadhar authentication History।


2- आधार नंबर और OTP लिखें
इसके बाद खुलने वाले पेज पर आपको अपना 12 डिजिट का आधार नंबर और पेज पर लिखा सेक्‍योरिटी कोड भरना होगा।
3- पिछले 6 महीनों का Biometric authentication रिकॉर्ड मिलेगा यहां
अब जो पेज आपके सामने खुलेगा, उस पर टॉप लेफ्ट साइड में एक नोटिस लगा होगा। इसमें लिखा है कि आप पिछले 6 महीनों के दौरान किए गए Biometric authentication के मैक्सिमम 50 रिकॉर्ड देख सकते हैं। यानि कि यहां आपको यह पता चलेगा कि किस दिन और तारीख को आपने आधार लिंकिंग के लिए UIDAI पर ट्रांजेक्‍शन किया था।
4- OTP डालें और ट्रांसेक्‍शन डीटेल भरें
इस पेज पर आपको Biometric authentication की डीटेल्‍स के लिए पिछली समयावधि और ट्रांजेक्‍शन टाइप और फोन पर आए ओटीपी को यहां भरना होगा।

5- यहां दिखेंगे Biometric authentication के सभी रिकॉर्ड
फाइनली अब जो पेज खुलेगा, उस पर पिछले महीनों के दौरान आपके द्वारा किए गए बायोमेट्रिक ट्रांजेक्‍शन की पूरी डीटेल्‍स मिलेगी। जिसमें तारीख, समय, ट्रांजेक्‍शन टाइप, रिसपॉन्‍स कोड सब कुछ होगा। अगर इस रिकॉर्ड में कुछ गड़बड़ या संदिग्‍ध लगे तो इस संबध में आप UIDAI की हेल्‍पलाइन पर संपर्क कर सकते हैं। वैसे बता दें कि जब भी आप कोई Biometric authentication प्रोसेस करते हैं तो UIDAI तुरंत ही आपकी ईमेल आईडी पर इससे जुड़ी एक मेल भेजता है। इसलिए कभी भी Biometric authentication करने के बाद अपनी ईमेल जरूर चेक कर लें। अगर बिना ट्रांजेक्‍शन के ऐसी कोई ईमेल मिले, तो तुंरत UIDAI को सूचित करें।
.......AMIT KATHERIYA

https://katheriyadhanuksamaj.blogspot.in

योग की कुछ 100 जानकारी जिसका ज्ञान सबको होना चाहिए

1.योग,भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है। 2. लकवा - सोडियम की कमी के कारण होता है । 3. हाई वी पी में - स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन ...